साथी 


‎तुम बहुत दूर के मुसाफिर थे
‎फिर तुम पास आए
‎कुछ दिन हम साथ रहते हैं
‎तुम्हें तख़्त से दर्द मिला
‎कुछ फूलों की भीनी खुशबू
‎दो लोगों में बाँटी गई
‎ऐसे सफ़र शुरू होता है
‎हमारी बातें और हमारा दर्द…   
‎सब हमारे ही रहे
‎किसे परवाह है उसकी
‎  

‎मैं दुनिया की राह पर चलूँगा और  
‎दुनिया के साथ
‎इसी उम्मीद के साथ…  
‎मैं तुम्हारे हाथ में हाथ रखता हूँ।  
‎ओह मेरे जीवन की आत्मा…  
‎तुमने जिस धुन के साथ गीत लिखा था
‎वो आज भी जिंदा है
‎लेकिन दर्द अभी भी है।  


‎मैं शब्दों को एक साथ सिलती हूँ
‎घास पर सिर रखते हुए…  
‎चाँद और सूरज की रोशनी हमारी छाती पर चमकती है
‎हम दोनों के घर को खुशी से भरते और सजाते हैं…

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