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Story : Two leaves A Bud ⬆️
Writer : Jotsna Jari
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Pulling water from the well, fiive or six boys and girls are bathing. There are still three or four houses with tubewells in hand. A wife is washing clothes on the bank of the well of the Mosque. A girl of twelve or thirteen is fetching water with a bucket.
That girl sees Titaas and comes forward. She wants to know in the regional language of Jharbari, how he is.
Although Titaas understands, he cannot speak this regional language well without practicing it. And when he speaks this regional language here, the pronunciation of Bengali language comes… so everyone laughs.
Titaas remembers this girl. Her mother died of cancer two years ago at the PG Hospital in Kolkata. Then he was a student of medical college.
Now the girl’s voice whispers in his ear, “Are you alright ?” It is a mixture of regional and pure Bengali language.
The day has been very melodious since this morning.
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Рассказ : Два листа Бутон ⬆️
Сценарист: Йотсна Яри
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Набирая воду из колодца, пять-шесть мальчиков и девочек купаются. Есть еще три-четыре дома с трубчатыми колодцами. Жена стирает белье на берегу колодца мечети. Девочка лет двенадцати-тринадцати набирает воду ведром.
Эта девушка видит Титааса и выходит вперед. Она хочет узнать на региональном языке Джарбари, как он.
Хотя Титаас понимает, он не может хорошо говорить на этом региональном языке, не практикуя его. И когда он говорит здесь на этом региональном языке, появляется произношение бенгальского языка… так что все смеются.
Титаас помнит эту девушку. Ее мать умерла от рака два года назад в больнице PG в Калькутте. Тогда он был студентом медицинского колледжа.
Теперь голос девушки шепчет ему на ухо: «Ты в порядке?» Это смесь регионального и чистого бенгальского языка.
День с утра стал очень мелодичным.
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کہانی: دو پتے ایک کلی
مصنفہ: جوتسنا جری
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کنویں سے پانی نکالتے ہوئے پانچ چھ لڑکے اور لڑکیاں نہا رہے ہیں۔ اب بھی تین چار گھر ایسے ہیں جن کے ہاتھ میں ٹیوب ویل ہیں۔ ایک بیوی مسجد کے کنویں کے کنارے کپڑے دھو رہی ہے۔ بارہ تیرہ سال کی لڑکی بالٹی لے کر پانی لے رہی ہے۔
وہ لڑکی تیتاس کو دیکھتی ہے اور آگے آتی ہے۔ وہ جھرباری کی علاقائی زبان میں جاننا چاہتی ہے کہ وہ کیسا ہے۔
اگرچہ تیتاس سمجھتا ہے، لیکن اس پر عمل کیے بغیر وہ اس علاقائی زبان کو اچھی طرح نہیں بول سکتا۔ اور جب وہ یہاں یہ علاقائی زبان بولتا ہے تو بنگالی زبان کا تلفظ آتا ہے… تو سب ہنس پڑتے ہیں۔
تیتاس کو یہ لڑکی یاد ہے۔ اس کی ماں کا دو سال قبل کولکتہ کے پی جی ہسپتال میں کینسر سے انتقال ہو گیا تھا۔ تب وہ میڈیکل کالج کا طالب علم تھا۔
اب لڑکی کی آواز اس کے کان میں سرگوشی کرتی ہے، “تم ٹھیک تو ہو؟” یہ علاقائی اور خالص بنگالی زبان کا مرکب ہے۔
آج صبح سے ہی دن بہت سریلی گزر رہا ہے۔
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कहानी : दो पत्ते एक बुद
लेखक: जोत्सना जरी
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कुएं से पानी खींचकर पांच-छह लड़के-लड़कियां नहा रहे हैं। अभी भी तीन-चार घर ऐसे हैं, जिनके हाथ में नलकूप हैं। एक पत्नी मस्जिद के कुएं के किनारे कपड़े धो रही है। बारह-तेरह साल की लड़की बाल्टी से पानी ले रही है।
वह लड़की तीतास को देखती है और आगे आती है। वह झरबारी की क्षेत्रीय भाषा में जानना चाहती है कि वह कैसा है।
हालांकि तीतास समझता है, वह इस क्षेत्रीय भाषा को अभ्यास के बिना अच्छी तरह से नहीं बोल सकता है। और जब वह यहां यह क्षेत्रीय भाषा बोलते हैं तो बंगाली भाषा का उच्चारण आता है… तो सभी हंस पड़ते हैं।
तितास को इस लड़की की याद आती है। उनकी मां की दो साल पहले कोलकाता के पीजी अस्पताल में कैंसर से मौत हो गई थी। तब वे मेडिकल कॉलेज के छात्र थे।
अब लड़की की आवाज उसके कान में फुसफुसाती है, “क्या तुम ठीक हो?” यह क्षेत्रीय और शुद्ध बंगाली भाषा का मिश्रण है।
आज सुबह से ही दिन बहुत सुहावना रहा है।
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গল্প : দুটি পাতা একটা কুঁড়ি ⬆️
লেখিকা : জ্যোৎস্না জরি
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কুঁয়ো থেকে জল তুলে স্নান করছে পাঁচ ছয়টা ছেলে মেয়ে । এখনও টিউবওয়েল হাতে গোনা তিন চারটে বাড়িতে আছে । মসজিদের কুঁয়োর পাড়ে কাপড় কাচছে একটি বউ । বালতি দিয়ে জল তুলছে বারো তেরো বছরের একটি মেয়ে । মেয়েটি তিতাসকে দেখে এগিয়ে আসে । ঝাড়বাড়ির আঞ্চলিক ভাষায় জানতে চায়, সে কেমন আছে ।
তিতাস বুঝতে পারলেও ঝাড়বাড়ির আঞ্চলিক ভাষা রপ্ত না করতে করতে ভালো বলতে পারে না । এখানকার আঞ্চলিক ভাষায় ও কথা বললে , শুদ্ধ বাংলার টান আসে বলে সবাই হাসাহাসি করে ।
মেয়েটিকে মনে পড়ছে, দু বছর আগে ওর মা ক্যান্সারে মারা গেছে কলকাতার পিজি হাসপাতালে । তখন ও মেডিকেল কলেজের ছাত্র । এখন মেয়েটির কণ্ঠস্বর কানের মধ্যে বোঁ বোঁ করে, “তি ভাল্ আসিস” । আঞ্চলিক ও শুদ্ধ বাংলা মেশানো কথা । আজ সকাল থেকে দিনটা সুরেলা কাটছে । তাই বুঝি !!
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